दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं, ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं
याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा, कल रस्ते में उस ने हम को पहचाना तो होगा
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है, अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है
दिल का हर दर्द खो गया जैसे, मैं तो पत्थर का हो गया जैसे
ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना, न सर पत्थर से टकराए तो कहना
कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बातें, जो ये फ़र्क़ समझ लेगा वो दीवाना तो होगा
हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ, मगर सुना है अभी वो मकान बाक़ी है
जागता ज़ेहन ग़म की धूप में था, छाँव पाते ही सो गया जैसे
ये गुल काग़ज़ हैं ये ज़ेवर हैं पीतल समझ में जब ये आ जाए तो कहना